
प्रकाश सराठे
रानीपुर। हर किसी क्षेत्र की एक पहचान वहां के खानपान को लेकर भी होती है। हर क्षेत्र में बनने वाला कोई न कोई व्यंजन या पकवान अपनी अलग पहचान बना ही लेता हैं। बैतूल जिला वैसे तो मिली जुली संस्कृति वाला जिला है। नतीजतन, यहां का खानपान भी मिला जुला है। मतलब सामान्यतः सभी तरह का खानपान यहां प्रचलित हैं। इसके बावजूद यहां की दो चीजों ने अपनी एक विशेष पहचान बनाई है। इनमें से एक है बैतूल बाजार की रबड़ी और दूसरा है रानीपुर के बड़े।
यूं तो समोसे और बड़े कोई बहुत विशेष आइटम नहीं माना जाता है। सड़क किनारे लगने वाली गुमठियों से लेकर होटल तक में समोसे और बड़े कॉमन आइटम है, लेकिन रानीपुर में मिलने वाले बड़े कॉमन आइटम बिलकुल नहीं हैं। यहां के बड़ों ने दूर-दूर तक अपनी खास पहचान बनाई है। यही कारण है कि कई लोग दूर-दूर से केवल बड़े खाने और लेने रानीपुर पहुंचते हैं। इसके अलावा जो भी लोग रानीपुर से गुजरते हैं वे तो इनका स्वाद लेने का मौका हरगिज नहीं चूकते। रानीपुर में बनने वाले बड़ों ने ही इस छोटे से गांव को एक अलग और विशेष पहचान दिलाई है।
अब बात करते हैं कि आखिर क्या वजह है कि रानीपुर में बनने वाले बड़े ही इतने प्रसिद्ध हैं, और कहीं बनने वाले बड़ों में वह स्वाद क्यों नहीं आ पाता जिसके लोग इस तरह कायल हो जाएं…? इसकी वजह है यहां बनने वाले बड़ों को विशेष तरह की दाल, मसालों और खास अंदाज में बनाया जाना। वैसे तो कई तरह की दाल और सब्जी से बड़े बनाए जाते हैं। लेकिन रानीपुर में जो बड़े बनते हैं वे केवल बरबटी की दाल के बनाए जाते हैं। साथ ही इन्हें बनाने में भी विशेष प्रक्रिया का पालन किया जाता है।
बड़ों के लिए मशहूर सौम्या रेस्टोरेंट के संचालक सुमित राठौर बताते हैं कि हम उच्च क्वालिटी की बरबटी की दाल का उपयोग बड़े बनाने में करते हैं। इस दाल को पीसने के लिए मिक्सर आदि का उपयोग नहीं किया जाता बल्कि शुद्ध देसी तरीके से आज भी सिलबट्टे पर ही दाल पीसी जाती है। इसके अलावा उसमें पर्याप्त मात्रा में मिर्ची, अदरक, लहसुन, हरी धनिया सहित अन्य मसाले का मिश्रण करते हैं। मसालों में भी किसी तरह की कोर कसर नहीं रखी जाती है। जिससे टेस्ट जायकेदार बना रहता है।
दूसरी खास बात यह है कि हम आज भी गैस सिलेंडर पर बड़े नहीं पकाते हैं। इन बड़ों को आज भी लकड़ी के चूल्हे पर ही पकाते हैं। यह बात तो आप भी जानते हैं कि लकड़ी के चूल्हे पर बनने वाली हर खाद्य सामग्री का टेस्ट ही अलग होता है। सुमित का मानना है कि पर्याप्त मात्रा में मसाले का मिश्रण, उच्च क्वालिटी की दाल और चूल्हे पर बनने के कारण ही बड़े बेहद स्वादिष्ट बनते हैं। वे बताते हैं कि सारणी और बैतूल से कई लोग तो रानीपुर सिर्फ बड़े खाने के लिए लिए ही पहुंचते हैं। वहीं कई लोग पार्सल के माध्यम से शहरों तक लेकर पहुंचते हैं।
तीन पीढ़ियों से बनी है पहचान
ऐसा नहीं है कि रानीपुर के मशहूर बड़े दो-चार साल से ही बन रहे हो। यहां बड़े बनाने का कार्य इन के बुजुर्ग दादा सुंदरलाल राठौर के समय से हो रहा है। दादा के द्वारा दिलाई गई पहचान को अब सुमित 90 वर्ष बाद भी बनाए हुए हैं। लोगों का कहना है आज भी वही टेस्ट बड़ों का बना है जो सालों पहले हुआ करता था। यही कारण है कि इन बड़ों की मांग भी लगातार बढ़ रही है। एक खास बात और है। अन्य स्थानों पर भले ही बड़े-समोसे जैसे आइटम की कीमत में खासा इजाफा हुआ है वहीं रानीपुर में आज भी 5 रुपए में ही बड़ा मिल जाता है।
अब नहीं बनते छोटे बड़े
रानीपुर के ही पूजा स्वीट्स के संचालक आनंद साहू ने बताया कि पहले बहुत छोटे आकार के बड़े बनाए जाते थे। उस समय लोग वह पसंद भी करते थे। उनकी कीमत भी कम रहती थी। लेकिन अब छोटे बड़े बनाने का कार्य पूर्ण रूप से बंद कर दिया गया है। विशेष ऑर्डर पर ही छोटे बड़े बनाए जाते हैं। आज से 25 साल पहले छोटे बड़े का चलन था। आजकल सभी लोग बड़े आकार का बड़ा खाना ही पसंद करते हैं। बड़े के साथ पुदीन हरा की चटनी, हरी मिर्च की चटनी एवं मट्ठा भी लोग शौकिया तौर पर खाते हैं।
+ There are no comments
Add yours