विषम परिस्थियो के इस समय में परिवार परामर्श केंद्र व अन्य सहायता केंद्रो पर बहूतायत में आ रहे परिवारों में शुरुआती हालतों में अधिकतर ये देखा गया है कि एक पक्ष की यही ख़्वाहिश होती है क़ि वो अकेले अपने परिवार से कही दूर अपना घर बसाए … जिससे उसे अपने ढंग से अपना जीवन जीने की आज़ादी हो ओर इसी आज़ादी की वजह से अब संयुक्त परिवार बिखर रहे है ओर वही दूसरी ओर अकेले रहने वाले एकल परिवार तनाव में जी रहे है . क्योंकि तेज़ी से बदलते हालात में पारिवारिक अपनापन व आपसी समन्वय के अभाव के बीच अधिक पैसा कमाने की होड़ व रोजगार के चलते शहर जाना या फिर अपना करियर बनाने की चाह में किसी और शहर की ओर पलायन करना, बच्चों के बेहतर भविष्य व अच्छी शिक्षा की वजह से अपनो से दूर होना हो ऐसे ही कुछ कारण है जिसने हमारे समाज में बिखराव के हालात बना दिए है या फिर यू कहे कि आज के इस दौर में संयुक्त परिवार के लोग अपनी मजबूरियों के कारण भी एकल परिवार की ओर बढ़ रहे है इन सब मजबूरियों के साथ साथ इन सबकी की कुछ एक जैसी समस्याएँ भी है जिससे आम आदमी को दो चार होना पड़ता है जैसे कि वे इतना नहीं कमाते हैं कि अपने माता पिता को भी साथ रख सकें या बड़े स्कूलों में पढ़ रहे बच्चों की वजह से सास–ससुर या अपने बड़े बुजुर्गों को अपने साथ रख उनका खर्च वहन कर सके लेकिन वही ये सब भूल जाते है कि आज के इस दुःख भरे काल में जहाँ करोना एक भीषण महामारी के रूप में हमारे लिए अभिशाप बनकर आया है वही ये संयुक्त परिवार ही है जहाँ हर उम्र के लोगों को का ख़्याल अनुभव के आधार पर रखा जा सकता है हम सब को ये मानना ही होगा कि सही अर्थों में परिवार ही वह व्यवस्था है जिसमें स्नेह,प्यार,सौहार्द, सहयोग,अपनापन, सुख-दु:ख, हम सबमें ओर हम सबके होने की आत्मीयता का भाव एक साथ उत्पन्न होता है ओर तभी जीवन-मूल्यों की सार्थकता के साथ अपना जीवन बेहतर ढंग से जिया जा सकता है इसलिए ये भी कहा जाता है कि परिवार ही वो जगह है जहां सबके साथ रहकर सबको सहने और सबको समझने की समझ पैदा होती है जिससे हम अनुशासन व अपनेपन के साथ अपने निर्णय लेने में सक्षम हो पाते है। लेकिन इन सब के बावजूद भी आज के इस मुश्किल दौर में कोई भी किसी को समझने या सहन करने को तैय्यार नहीं है यही कारण है कि परिवारों बीच में होने वाला अपनापन व विश्वास अब संदेह में बदल रहा है । संयुक्त राष्ट्र अमेरिका जैसे आधुनिक व शक्तिशाली देश जो पश्चिमी सभ्यता के साथ ही जीना पसंद करते वह देश भी अब संयुक्त परिवारों की बात करने लगे है इसलिए इस पाश्चात्य संस्कृति वाले देश ने सन 1994 को अंतर्राष्ट्र्रीय परिवार वर्ष घोषित करने का निर्णय लिया ओर इसी कारण दुनिया भर के लोगों के परिवार की अहमियत बताने के लिए हर साल 15 मई को अंतर्राष्ट्रीय परिवार दिवस मनाने लगे है परिवारों की उपयोगिता व उसकी महत्ता को विस्तृत में समझाने के लिए विश्व भर की सभी सरकारें अपनी विभिन्न संस्थाओं व अपने उपक्रमों के माध्यम से अनेक कार्यक्रम आयोजित करवा रही हैं जिनका मुख्य केंद्र समाज व उसके अंतर्गत आने वाले परिवार ही होते है ओर अब तो लोग इसे दिल से स्वीकारते है कि परिवार ही सामाजिक संगठन की मूल व्यवस्था है परिवार के बिना इस मानव समाज के संचालन व समाज कल्याण की सारी व्यवस्थाये बेमानी है . क्योंकि इस समाज का प्रत्येक व्यक्ति कही ना कही , किसी-न-किसी परिवार का सदस्य रहा है ओर उसका अस्तित्व भी उसी परिवार या उसी समाज से है इसीलिए उससे अलग होकर उसके अस्तित्व के बारे में सोचा भी नहीं जा सकता है फिर परिवार चाहे बनकर टूटे हो या टूटकर बने हो उनके अस्तित्व व उसके मूल्यों को आप नकार नहीं सकते इसलिए आज भी भारत जैसे देश में कहा जाता है की आधुनिक युग में आप कैसे भी जी रहे हो पर आपको जन्म,मृत्यु ,विवाह व अन्य संस्कार आपको आपके परिवार के अनुरूप ही करने होते है या यू कहे कि ये सब क्रियाएँ आपको अपने परिवार ओर उससे मिले संस्कारों के अनुसार ही करनी होती है ओर यही सब प्रकिया आपको आपके परिवार ओर उससे मिले संस्कारों की ओर ले जाती है इस करोना महामारी के काल में लोगों को परिवारों की अहमियत का अहसास अच्छी तरह से हो ही रहा है इसलिए अब हमें अपनी बुद्धि और अपने विवेक से यह विचारना होगा कि आधुनिकता ओर एक़ला चलो के भाव से ज़्यादा अच्छा है कि हम सब मिलकर पारिवारिक परंपराओं के अनुरूप एक साथ रहे ओर एक दूसरे ख़याल रखकर अपने अपने परिवारों को बिखरने व बिछड़ने से बचाए …
राजेश आहूजा
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