सजे-धजे स्टेशन के वेटिंग रूम में दुल्हन बनी दुर्गा कुली

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  • पहली महिला कुली का आरपीएफ और रेलकर्मियों ने कराया विवाह
  • हल्दी रस्म से लेकर विवाह के सात फेरों तक सभी ने निभाया फर्ज

खूब मनाओ खुशियां पर किसी और की खुशी में शामिल होकर देखो।
जो उठाती है रेल यात्रियों का बोझ
उसका थोड़ा सा सहारा बनकर देखो।।
खुशियों में उसकी शामिल होकर प्यार और आशीर्वाद लुटाकर तो देखो।
पिटारा भरा खुशियों का देकर गरीब
कन्या के चेहरे पर मुस्कान लाकर तो देखो।।

बैतूल। ऊपर लिखी गई इन पंक्तियों को सभी ने सच होते हुए रेलवे स्टेशन के कम्प्यूनिटी हॉल में उस समय देखा जब इकलौती महिला कुली दुर्गा बोरकर का विवाह संपन्न होने जा रहा था। शहर की समाजसेवी महिलाओं, पुरूषों सहित जनप्रतिनिधि ने विवाह में शामिल होकर जब दुर्गा कुली को आशीर्वाद, स्नेह और प्यार दिया तो उसका मन भी खुशियों से झूम उठा। अत्यंत गरीब परिवार से ताल्लुक रखने के बावजूद भी सामर्थ अनुसार हर वह रस्म अदा की गई जो कि एक सामान्य व्यक्ति के विवाह में की जाती है। रेलवे स्टेशन के वेटिंग रूम में हल्दी की रस्म से लेकर विवाह की सभी रस्में निभाई गई। यह दृश्य जिस किसी ने भी देखा उसका मन खुशी से गदगद हो गया कि एक गरीब कन्या के हाथ भी पीले हो गए और अब वह जिंदगी शुरू करेगी। इस दौरान सांसद डीडी उइके, विधायक हेमंत खंडेलवाल ने भी पहुंचकर दुर्गा को आशीर्वाद दिया।

धूमधाम से रेलवे स्टेशन पर हुई शादी

रेलवे स्टेशन पर महिला कुली ने धूमधाम से शादी रचाई। स्टेशन के कम्युनिटी हॉल में शादी की रस्में हुईं। बाबा साहब डॉ. भीमराव अंबेडकर की तस्वीर के सामने वर-वधु ने एक-दूसरे के गले में वरमाला डालकर साथ रहने का संकल्प लिया। इससे पहले बुधवार रात को वेटिंग रूम में हल्दी का कार्यक्रम भी हुआ। दुर्गा यहां रेलवे स्टेशन पर कुली है। गुरुवार को वह आठनेर के सुरेश भम्मरकर के साथ विवाह सूत्र में बंध गई।

हल्दी रस्म में विधायक और सांसद भी पहुंचे

बुधवार रात को वेटिंग रूम में अलग ही नजारा था। महिलाएं गाना गाते हुए डांस कर रही थीं। कुली दुर्गा को बारी-बारी से हल्दी लगाई जा रही थी। सांसद डीडी उईके भी पहुंचे, उन्होंने दुर्गा को हल्दी लगाकर रस्म की शुरुआत की। रेलवे के कर्मचारी, अधिकारी, आरपीएफ जवान और समाजसेवी कुली दुर्गा की शादी में शामिल हुए। कुली दुर्गा ने बताया, मेरे दिन-रात इसी रेलवे स्टेशन पर यात्रियों के वजन ढोते हुए गुजरते हैं। आज इसी रेलवे स्टेशन पर मैंने शादी रचाई। शादी में स्थानीय विधायक हेमंत खंडेलवाल, आरपीएफ पोस्ट बैतूल और आमला के अधिकारी, उनके परिवार बाराती बनकर आए।

परिवार की जिम्मेदारी उठाने बनी कुली

बैतूल रेलवे स्टेशन पर मुन्ना बोरवार कुली के तौर पर काम करते थे। उनकी तीन बेटियां हैं। मुन्ना ज्यादा समय तक कुली का काम नहीं कर पाए और उनका चलना फिरना छूट गया। परिवार की जिम्मेदारी उठाने के लिए 18 साल की बेटी दुर्गा ने कुली बनने का फैसला किया। पिता के कुली का बिल्ला अपने नाम करने के लिए उसने प्रयास शुरू किया। लेकिन लड़की होना इसके आड़े आ गया।

संषर्घ भरा रहा अब तक का जीवन

लगातार 2 साल चक्कर लगाने के बावजूद उसे बिल्ला नहीं मिल पाया। आखिर बैतूल में रेल संघों से जुड़े पदाधिकारी अशोक कटारे और वीके पालीवाल के प्रयास से दुर्गा को बिल्ला मिल गया। 2011 से वह बैतूल रेलवे स्टेशन पर कुली का काम कर रही है। 2016 में दुर्गा की मां ममता का निधन हो गया। एक साल बाद पिता मुन्ना ने भी दम तोड़ दिया। बड़ी बहन बीमारी के चलते एक बेटी को छोड़कर चल बसी। एक बहन और भांजी की जिम्मेदारी दुर्गा ही उठा रही है। कभी खुद का घर बसाने का सोचा ही नहीं।

ऐसे तय हुआ कुली दुर्गा का रिश्ता

दुर्गा सुबह से शाम तक रेलवे स्टेशन पर कुली का काम करती रहती थी। इस बीच उसकी दोस्ती आरपीएफ थाने में पदस्थ आरक्षक फराह खान से हो गई। फराह खान उसके जीवन को लेकर अक्सर सोचती रहती थी। फराह ने ही एक अन्य साथी सिपाही दीपक देशमुख से दुर्गा के रिश्ते की बात चलाने को कहा। देशमुख ने उसके लिए बैतूल से 35 किमी दूर गांव आठनेर में एक लड़के की तलाश की और उससे बातचीत शुरू की। यह बातचीत परवान भी चढ़ गई। लड़के ने शादी के लिए हां कर दी और आखिर दुर्गा का रिश्ता तय हो गया। लेकिन इस रिश्ते की शर्त यही थी कि दुर्गा के पास रहने वाली उसकी बड़ी बहन की 6 साल की बेटी को भी दूल्हे को अपनाना होगा। इसे लेकर भी दूल्हे ने हां कर दी। जिसके बाद यह शादी तय हो गई।

इनका कहना…
सौभाग्य का विषय है कि हमारी दुर्गा बिटिया देश की बेटियों के लिए प्रेरणा का स्रोत है। कुली के रूप में अपने सामर्थ के साथ में दायित्व निभा रही है और अपने परिवार के उदर पोषण के लिए यह काम कर रही है महिला सशक्तिकरण के लिए बड़ा उदाहरण है।
दुर्गादास उइके, सांसद, बैतूल
दुर्गा को मैं ढाई साल से जानती हूं और देखती हूं कि बहुत मेहनत करती है। मैंने उसको बोला की दुर्गा मैरिज क्यों नहीं करती हो? उसने कहा परिवार की जिम्मेदारी है लेकिन हम लोगों ने प्रयास किया और रिश्ता देखा दुर्गा तैयार हो गई।
फराह खान, आरक्षक, आरपीएफ, बैतूल
मेरे पिता रेलवे स्टेशन पर खुली थे और उन्होंने बोला कि अब मुझसे काम नहीं होगा। परिवार का कैसे गुजारा होगा? मैंने सोचा कि मैं घर का सहारा बनूंगी। मैंने कड़ी मेहनत की रेलवे अधिकारियों ने सहारा दिया और पिता का बिल्ला दिलवाया।
दुर्गा बोरकर, महिला कुली, बैतूल

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