सारनी। भारतीय संस्कृति में गुरू का स्थान सर्वोपरि है। गुरु हमारे जीवन का सबसे बड़ा पथ प्रदर्शक होता है। एक श्रेष्ठ गुरु अपने शिष्य में शिक्षा और सदाचरण के माध्यम से उन गुणों के संस्कार भरता है, जो समाज और राष्ट्र जीवन में कार्य करने में उसके सहायक बने। एक आदर्श और श्रेष्ठ शिष्य भी वही होता है जो अपने गुरु के बताए मार्ग का अनुसरण करता हुआ जीवन जीता है तथा समाज में अपना और अपने गुरु का नाम गौरवान्वित करता है। यह विचार संस्कार भारती द्वारा गुरु पूर्णिमा के अवसर पर सरस्वती विद्या मंदिर में आयोजित नटराज पूजन एवं सम्मान समारोह में नगर के वरिष्ठ साहित्यकार दशरथ पाल” सागर” ने व्यक्त किए। कार्यक्रम का शुभारंभ दीप प्रज्वलन एवं भगवान नटराज के पूजन से हुआ तत्पश्चात संस्कार भारती के ध्येय गीत का सामूहिक गायन हुआ।मंचस्थ अतिथियों के परिचय एवं स्वागत के उपरांत संस्कार भारती सारनी के अध्यक्ष अंबादास सूने ने संस्कार भारती के संगठनात्मक परिचय एवं गुरु पूर्णिमा उत्सव के महत्व पर अपने विचार रखे। कार्यक्रम में मुख्य रूप से उपस्थित वरिष्ठ व वयोवृद्ध कवि दशरथ पाल “सागर” ने अपने उद्बोधन संस्कार भारती के द्वारा किये जा रहे कार्यों की सराहना करते हुए प्रसन्नता प्रकट की। इस अवसर पर संस्कार भारती इकाई द्वारा साहित्यिक क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान के लिए साहित्यकार श्री सागर का शाल , श्रीफल एवं प्रशस्ति -पत्र भेंट कर सम्मान किया गया। कार्यक्रम का संचालन साहित्य विधा प्रमुख राजेन्द्र तिवारी एवं आभार प्रदर्शन इकाई महामंत्री दीपक वर्मा ने किया। इस अवसर पर संस्कार भारती के पदाधिकारी एवं सदस्यगण में मातृ-शक्ति प्रमुख श्रीमती पुष्पलता बारंगे, जितेन्द्र वर्मा, मनीष चौहान, बाची नायडू, प्रभुलाल यादव, पवन मेहरा, सोहनलाल कहार, संतोष प्रजापति, लक्ष्मण धोटे, ब्रजेश सोनी, धर्मेश मालवीय, बाबूराव गीद, प्रवीण सोनी, नंदकिशोर कुशवाह आदि उपस्थित थे।
संस्कार भारती ने गुरुपूर्णिमा पर नगर के वरिष्ठ एवं वयोवृद्ध कवि सागर का किया सम्मान
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