मो.अली
भारतीय राजनीति के फलक पर पिछले कुछ समय में जो सबसे बड़ा बदलाव दिखा है, वह है कांग्रेस पार्टी का पुनरुत्थान। विपक्षी एकता के नाम पर बने ‘इंडिया’ गठबंधन के भीतर की अंदरूनी ताकत का संतुलन अब पूरी तरह बदल चुका है। कभी क्षेत्रीय दलों के दबाव में बैकफुट पर रहने वाली कांग्रेस आज उस मुकाम पर खड़ी है, जहाँ गठबंधन के भीतर उसे चुनौती देने वाला कोई दूसरा दल नज़र नहीं आता।
सवाल अब यह नहीं है कि क्षेत्रीय दल कांग्रेस को कितनी सीटें देंगे, बल्कि सवाल यह है कि क्या कांग्रेस को अब वाकई इस गठबंधन की बैसाखी की जरूरत बची भी है या नहीं?
दक्षिण का किला जहाँ कांग्रेस का सिक्का चलता है
दक्षिण भारत की राजनीति हमेशा से दिल्ली की सत्ता का रास्ता तय करने में अहम रही है। आज दक्षिण के राज्यों में कांग्रेस बेहद मजबूत स्थिति में है
कर्नाटक और तेलंगाना में कांग्रेस की पूर्ण बहुमत की सरकारें मजबूती से चल रही हैं।
तमिलनाडु में वह सत्ताधारी डीएमके गठबंधन का एक अनिवार्य और मजबूत हिस्सा है। वहीं, राज्य की उभरती राजनीतिक ताकतों और क्षेत्रीय समीकरणों पर भी कांग्रेस की पैनी नजर है।
आंध्र प्रदेश में वाईएस शर्मिला के जरिए कांग्रेस ने अपनी जमीन वापस पानी शुरू कर दी है। राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा बेहद गर्म है कि जगन मोहन रेड्डी के साथ भी कांग्रेस के पर्दे के पीछे समीकरण बन रहे हैं। अगर यह समझौता होता है, तो आंध्र में कांग्रेस किंगमेकर की भूमिका में आ जाएगी।
’रनर-अप’ नहीं, भाजपा के सामने एकमात्र राष्ट्रीय विकल्प
देश के हिंदी पट्टी और बड़े राज्यों का गणित देखें, तो क्षेत्रीय दल कहीं रेस में ही नहीं हैं। महाराष्ट्र, राजस्थान, हरियाणा, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और उत्तराखंड जैसे बड़े राज्यों में कांग्रेस ही मुख्य विपक्षी दल है।
इन राज्यों में मुकाबला सीधे तौर पर भाजपा बनाम कांग्रेस है।
हिमाचल प्रदेश में कांग्रेस की अपनी सरकार है।
जम्मू-कश्मीर में उमर अब्दुल्ला सरकार के साथ कांग्रेस के संबंध और गठबंधन की हिस्सेदारी यह साबित करती है कि सीमांत राज्यों में भी कांग्रेस के बिना राजनीतिक स्थिरता संभव नहीं है।
क्षेत्रीय क्षत्रपों की मजबूरी बनी कांग्रेस
उत्तर प्रदेश और झारखंड जैसे राज्यों का उदाहरण सबसे दिलचस्प है:
उत्तर प्रदेश में अखिलेश यादव (समाजवादी पार्टी) के साथ कांग्रेस का तालमेल अब महज एक चुनावी समझौता नहीं, बल्कि भाजपा के खिलाफ एक मजबूत सामाजिक ब्लॉक बन चुका है।
झारखंड में हेमंत सोरेन की सरकार कांग्रेस के समर्थन और गठबंधन के बिना चल ही नहीं सकती।
किसे किसकी जरूरत?
राजनीतिक विश्लेषकों का एक बड़ा वर्ग अब यह मानने लगा है कि “कांग्रेस अब ‘इंडिया’ गठबंधन की मोहताज नहीं है, बल्कि ‘इंडिया’ गठबंधन को अपनी प्रासंगिकता बचाए रखने के लिए कांग्रेस की सख्त जरूरत है।”
इसके पीछे तीन मुख्य कारण हैं:
राष्ट्रीय चेहरा: ममता बनर्जी, अखिलेश यादव, अरविंद केजरीवाल या स्टालिन अपने-अपने राज्यों के कद्दावर नेता हो सकते हैं, लेकिन इनमें से किसी के पास भी अखिल भारतीय स्वीकार्यता नहीं है। देश के स्तर पर भाजपा और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सामने केवल कांग्रेस और राहुल गांधी का ही चेहरा राष्ट्रीय विकल्प के रूप में खड़ा हो सकता है।
मोलतोल की बढ़ती ताकत हालिया चुनावों में अपने बेहतर प्रदर्शन के दम पर कांग्रेस ने यह साबित कर दिया है कि उसका पारंपरिक वोट बैंक वापस लौट रहा है। अब कांग्रेस गठबंधन में ‘जूनियर पार्टनर’ बनकर रहने के मूड में बिल्कुल नहीं है।
वोट ट्रांसफर की क्षमता: गठबंधन में यह देखा गया है कि क्षेत्रीय दलों का वोट तो कांग्रेस को ट्रांसफर हो जाता है, लेकिन कांग्रेस का राष्ट्रीय और सेक्युलर वोट बैंक भी क्षेत्रीय दलों की जीत की सबसे बड़ी गारंटी बनता है।
निष्कर्ष: बदल गई है भारतीय राजनीति की धुरी
इसमें कोई दो राय नहीं कि केंद्र की सत्ता तक पहुँचने के लिए सीटों के गणित के लिहाज से क्षेत्रीय दलों का साथ जरूरी है, लेकिन अब गठबंधन की शर्तें कांग्रेस तय करेगी। ‘इंडिया’ गठबंधन का रिमोट कंट्रोल अब किसी क्षेत्रीय क्षत्रप के हाथ में नहीं, बल्कि सीधे कांग्रेस आलाकमान के हाथ में आ चुका है। कांग्रेस अब महज एक सहयोगी दल नहीं, बल्कि विपक्ष की निर्विवाद ‘लीडर’ है।
क्या ‘इंडिया’ गठबंधन में अब ‘बॉस’ की भूमिका में आ चुकी है कांग्रेस?
+ There are no comments
Add yours