• LLM में गोल्ड मेडलिस्ट भी रहीं प्रखरश्री; बोलीं- कोई सांसारिक पद बड़ा नहीं


बैतूल। वकालत (LLM) की पढ़ाई में गोल्ड मेडल हासिल किया। लंदन में कोर्स किया। सिविल जज के लिए चयनित हुईं, लेकिन जॉइन नहीं किया। अब साध्वी बनने जा रही हैं।
यह कहानी बैतूल की प्रखरश्री जैन (26) की है। अब वे ब्रह्मचारिणी बनने जा रही हैं। जैनेश्वरी दीक्षा का संकल्प लेकर उन्होंने मोक्ष का मार्ग चुना है। उनके पिता LIC से रिटायर्ड अफसर हैं।
उनके साथ चार्टर्ड अकाउंटेंट (CA) समेत चार अन्य बहनों ने भी सांसारिक मोह छोड़कर भक्ति का मार्ग अपनाया है। रविवार को बैतूल में पांचों बहनों की बिनौली यात्रा निकाली गई। परिजन और रिश्तेदार ढोल की थाप पर नाचते-गाते यात्रा में शामिल हुए।
भोपाल से लंदन तक पढ़ाई, गोल्ड मेडल हासिल किया
प्रखरश्री ने प्राइमरी की पढ़ाई बैतूल से की। इसके बाद मिडिल और हायर सेकंडरी की पढ़ाई भोपाल के संस्कार वैली स्कूल से की। वे शुरुआत से ही मेधावी थीं।
12वीं के बाद उन्होंने कानून के क्षेत्र में करियर बनाने का फैसला किया। कॉमन लॉ एडमिशन टेस्ट (CLAT) क्वालिफाई कर अहमदाबाद से LLB किया। LLM में गोल्ड मेडल हासिल किया।
उच्च शिक्षा के लिए लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स से भी कोर्स किया। साल 2023 में सिविल जज की परीक्षा में चयनित हुईं। यह उपलब्धि परिवार के लिए बड़ी थी, लेकिन प्रखरश्री का लक्ष्य कुछ और था।
प्रखरश्री बोलीं- बचपन से मन में था, गुरु सानिध्य ने दिखाई राह
प्रखरश्री ने बताया कि बचपन से ही मन में संयम का जीवन अपनाने का भाव था। उन्होंने शादी नहीं करने और सांसारिक जीवन से दूर रहकर साधना करने का विचार भी पहले ही बना लिया था। उन्होंने बताया-
घर में धार्मिक माहौल था। माता-पिता से मिले संस्कार, जिनवाणी का अध्ययन और गुरुजनों का सानिध्य उनके भीतर वैराग्य के भाव को लगातार मजबूत करता गया।
उन्होंने बताया कि आचार्य विद्यासागर महाराज से उन्हें आजीवन ब्रह्मचर्य का व्रत मिला था। इसका पालन करते हुए जीवन में विशुद्धि बढ़ती गई।
‘यह रास्ता कठिन नहीं, बल्कि सबसे सरल है’
प्रखरश्री से पूछा गया कि लाड़-प्यार में पली-बढ़ी होने और अच्छी शिक्षा हासिल करने के बावजूद उन्होंने कठिन मार्ग क्यों चुना। इस पर उन्होंने कहा कि यह रास्ता कठिन नहीं, बल्कि सबसे सरल है।
उन्होंने बताया कि दूर से यह मार्ग कठिन लगता है, लेकिन इस पर आगे बढ़ने से सब सरल होता जाता है।
सिविल जज की परीक्षा में चयन को लेकर उन्होंने कहा कि वहां पहुंचकर एहसास हुआ कि सांसारिक पद बड़ा नहीं है। आर्यिका व्रत धारण करना सबसे बड़ा पद है। बाकी सभी पद अस्थायी हैं। इसी विचार ने उनके संकल्प को और मजबूत किया।
पिता बोले- 2020 में ही तय कर लिया था
प्रखरश्री के पिता जेके जैन LIC में विकास अधिकारी के पद से रिटायर हुए हैं। उन्होंने बताया कि परिवार का माहौल शुरू से धार्मिक रहा है। बेटी भी बचपन से धार्मिक गतिविधियों और साधु-संतों के सानिध्य से प्रभावित थी।
अहमदाबाद में पढ़ाई के दौरान भी उसका जीवन सात्विक होता गया। वह दिगंबर साधुओं के दर्शन के लिए जाती थी और शाकाहार समेत कई नियमों का पालन करने लगी थी।
साल 2016 में बेटी ने आचार्य विद्यासागर महाराज के दर्शन के दौरान उनसे नियम देने का आग्रह किया था। इसके बाद शिक्षा पूरी होने तक ब्रह्मचर्य का पालन किया।
वर्ष 2020 में बेटी ने आजीवन ब्रह्मचर्य का व्रत लेने की इच्छा जताई। आचार्यश्री ने इस संबंध में हमसे सहमति मांगी। हमने कहा कि आप जो आदेश देंगे, स्वीकार है।
सिविल जज की परीक्षा के दौरान भी गुरु का मार्गदर्शन
साल 2023 में प्रखरश्री सिविल जज की परीक्षा दे रही थीं। उस समय पिता भी उनके साथ रायपुर और डोंगरगढ़ गए थे। वहां उन्होंने आचार्यश्री से मार्गदर्शन मांगा था।
पिता के मुताबिक, आचार्यश्री ने बेटी के चयन को लेकर संकेत दिया था। उन्होंने गुरु मां को प्रखरश्री की साधना के बारे में भी बताया था।
अब बेटी नहीं, मां के संबोधन से पूजनीय होंगी
पिता ने कहा कि आज जब माता-पिता बच्चों के भविष्य और संस्कारों को लेकर चिंतित रहते हैं, तब बेटी का यह निर्णय गर्व की बात है। अब रिश्तों के संबोधन भी बदल जाएंगे।
भावुक होकर उन्होंने कहा कि आज के बाद बेटी घर का त्याग कर देगी। अब वह हमारी बेटी नहीं, बल्कि मां के संबोधन से पूजनीय होगी। वह हमें भक्त की दृष्टि से देखेगी और हम उसे श्रद्धा की दृष्टि से देखेंगे।
दीक्षा के बाद प्रखरश्री का जीवन बदल जाएगा। उन्हें भोजन, पानी और वस्त्र से जुड़े कठोर नियमों का पालन करना होगा। पिता ने कहा कि यह रास्ता आसान नहीं है, लेकिन बेटी के संकल्प और साधना पर उन्हें गर्व है।
रोते हुए मां बोलीं- गर्व है कि बेटी ने यह रास्ता चुना
बेटी की विदाई के समय मां ज्योति जैन के मन में खुशी और चिंता दोनों थीं। आंखों में आंसू भरकर उन्होंने बताया कि बेटी मां के सबसे करीब होती है। जब प्रखर ने वैराग्य का मार्ग चुनने की इच्छा जताई, तो पहले झटका लगा था।
उन्हें चिंता थी कि सामान्य जीवन से अलग और कठिन साधना वाले इस मार्ग पर लाड़-प्यार में पली बेटी कैसे चल पाएगी।
वे कहती हैं, ‘एक मन गौरवान्वित होता है कि ऐसा दुर्लभ अवसर हमारे परिवार को मिला। दूसरा मन चिंता करता है कि वह इस कठिन रास्ते को कैसे निभाएगी। दोनों भाव एक साथ चलते हैं।’
शादी और दीक्षा की विदाई में अंतर
ज्योति कहती हैं कि शादी के बाद बेटी को विदा करना और वैराग्य के मार्ग पर विदा करना अलग अनुभव है। इस मार्ग की कठिनाइयों को जानने के कारण चिंता होती है, लेकिन उन्हें विश्वास है कि बेटी का भविष्य उज्ज्वल होगा।
वह जन्म-जन्मांतर के बंधनों से मुक्त होकर आत्मकल्याण की दिशा में बढ़ेगी। उन्होंने कभी बेटी को इस मार्ग पर जाने से मना नहीं किया।
चार और बहनें भी छोड़ेंगी सांसारिक जीवन, इनमें एक CA
प्रखरश्री अकेली नहीं हैं, जिन्होंने सांसारिक जीवन छोड़कर संयम और साधना का मार्ग चुना है। उनके साथ चार अन्य बहनें भी जैनेश्वरी दीक्षा लेने जा रही हैं।
इनमें चार्टर्ड अकाउंटेंट (CA) रंगोली दीदी, प्रखरश्री दीदी, गिरजा दीदी, चेतना दीदी और सोनम दीदी शामिल हैं।
पांचों बहनें अलग-अलग शैक्षणिक और पेशेवर पृष्ठभूमि से आती हैं। उन्होंने सांसारिक उपलब्धियों से आगे आध्यात्मिक जीवन को लक्ष्य बनाया है।
22 नवंबर को उज्जैन में होगी दीक्षा
रविवार को बैतूल में पांचों दीक्षार्थी बहनों की बिनौली यात्रा निकाली गई। जैन समाज के लोगों ने उनका स्वागत किया और मंगल आशीर्वाद दिया। यात्रा में प्रखरश्री के चेहरे पर प्रसन्नता और संतोष नजर आया।
वहीं, परिवार के लोग भावुक भी हुए। मुख्य जैनेश्वरी दीक्षा समारोह 22 नवंबर 2026 को जैन सिद्ध क्षेत्र सोनागिरि में आयोजित होगा।
समारोह गणाचार्य भगवान श्री विराग सागर जी महाराज और पदाचार्य श्री पदमसागर जी महाराज के मंगल आशीर्वाद तथा गणिनी आर्यिका विशाश्री माताजी की छत्रछाया में होगा।

By Vishal

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