सारनी। भूतपूर्व वेकोलि कर्मचारी स्वर्गीय हीरालाल वाईकर के सुपुत्र और वर्तमान श्रमिक नेता राकेश वाईकर के छोटे भाई प्रशांत ने डाटा साइंस एवं कम्प्यूटर प्रोग्रामिंग पर आधारित शोध को अन्तर्राष्ट्रीय शोध जर्नल ‘वेटरिनरी साइंसेज’ ने अपने मई के अंक में प्रकाशित किया है। गौरतलब है कि जहां पूरा विश्व कोरोना के संक्रमण से प्रभावित है वही प्रशांत अमेरिका के ग्रीन्सबोरो स्थित यूनिवर्सिटी ऑफ नार्थ कैरोलिना से पीएचडी की पढ़ाई कर दिन रात शोध में लगे हुए है। जिससे वह अपने क्षेत्र ही नही अपितु अपने देश का नाम भी रौशन कर सके। इस शोधपत्र में दुनिया में पाई जाने वाली सबसे आम मधुमक्खी ‘एपिस मेलीफेरा’ पर आजतक हुई सारी शोधों के डाटा का उपयोग किया गया। प्रशांत ने बताया कि देश दुनिया में जब भी कोई बड़ी या दिलचस्प घटना घटित होती है तो सब उसके बारे में बात करने लगते हैं। समाचार, अखबारों और सोशल मीडिया में लगातार आने पर यह घटना ‘ट्रेंडिंग टॉपिक’ बन जाती है। परन्तु अनुसंधान के क्षेत्र में ऐसे ट्रेंडिंग टॉपिक उजागर नहीं हो पाते क्योंकि कई बार शोध की खबरें आम जनता तक बिल्कुल नहीं पहुंचती या तो कुछ गिनी-चुनी शोध ही पहुंच पाती है। इस शोधपत्र में मधुमक्खी के ऊपर हुई शोध को कम्प्यूटर प्रोग्रामिंग की मदद से एनालिसिस करके ट्रेंड देखा गया। इसमें पाया गया कि वर्ष 1957 से 2010 तक मधुमक्खी की शोध में तीव्र गति से वृद्धि हुई और उसके बाद यह वृद्धि रूक गई। इससे यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि दुनिया भर में मधुमक्खी के शोध कर्ताओं की संख्या नहीं बढ़ पा रही जो शोध संस्थानो या शोध बजट की कमी के कारण हो सकता हैं। इस शोधपत्र में 2006 में अमेरिका में आई मधुमक्खी की महामारी ‘काॅलोनी कोलाप्स डिसोर्डर’ के शोध पर हुए प्रभाव को भी जांचा गया। यह महामारी समाचारों में इतनी ट्रेंड हुई कि 2006 मधुमक्खी की शोध का सबसे महत्वपूर्ण वर्ष समझा जाने लगा। हालांकि इस खोज में यह धारणा गलत साबित हुई और पता चला कि वर्ष 2006 नहीं अपितु वर्ष 1991-92 मधुमक्खी की शोध में सबसे प्रभावशाली समय था। इसके कई कारण प्रस्तावित किए गए जिनमें मधुमक्खी के लिए घातक परजीवी घुन, शोध एवं प्रौद्योगिकी में उन्नयन, इंटरनेट की शुरुआत के अलावा पश्चिमी यूरोप में हुए राजनीतिक बदलाव शामिल हैं। शोध में वैज्ञानिकों एवं कम्प्यूटर के द्वारा आविष्कारों की सही अभिव्यक्ति करनें की तुलना भी की गई है। प्रशांत के अलावा इस शोध की टीम में विश्वविद्यालय के जीवविज्ञान एवं कम्प्यूटर साइंस के शोधकर्ता शामिल हैं। उक्त सराहनीय कार्य के लिये उनके परिवार और इष्ट मित्रो ने हर्ष व्यापत किया है।