- “पहले 4 इंसानो का शिकार , फिर शिकारी बाघिन खुद मौत के मुंह में चली गई…”
बैतूल। मध्यप्रदेश के बैतूल जिले की सीमा से लगे महाराष्ट्र के अमरावती जिले में पिछले कई दिनों से जिस नाम ने गांवों की रातों की नींद और दिन का चैन छीन रखा था, आखिरकार उसका अंत हो गया। यह नाम था—‘पिंकी’। चार लोगों की जान लेने वाली इस बाघिन को पकड़ने के लिए वन विभाग और रेस्क्यू टीम ने शिरजगांव कसबा क्षेत्र में अभियान चलाया। टीम ने मौका मिलते ही उसे डार्ट कर ट्रैंक्वलाइज कर दिया। बाघिन बेहोश हुई, लेकिन फिर दोबारा नहीं जाग सकी। उसकी मौत हो गई।
पिंकी की मौत के साथ चांदूरबाजार तहसील और आसपास के गांवों में फैली दहशत फिलहाल खत्म हो गई है। लेकिन बाघिन की मौत ने वन विभाग की कार्रवाई और ट्रैंक्वलाइजेशन की प्रक्रिया को लेकर कई सवाल भी खड़े कर दिए हैं। अब यह जानना महत्वपूर्ण होगा कि बेहोश करने के बाद उसकी हालत किन परिस्थितियों में बिगड़ी और उसे होश में लाने की कोशिश क्यों सफल नहीं हुई।
चार मौतों ने बदल दी थी गांवों की जिंदगी
पिंकी का आतंक किसी एक घटना तक सीमित नहीं था। उसके हमलों की कड़ी में चार इंसानी जानें जा चुकी थीं। आष्टी के किसान राजाभाऊ भोयर, मोर्शी तहसील के भांबोरा निवासी चरणदास विखे, चांदूरबाजार तहसील के सोनौरी की 22 वर्षीय उर्मिला बाजीराव इवने और शिरजगांव कसबा के किसान दामू भाऊ आवारे उसके हमलों में मारे गए।
एक के बाद एक हमलों ने ग्रामीणों के भीतर ऐसा भय पैदा कर दिया था कि खेतों की ओर जाने वाले रास्ते भी डरावने लगने लगे थे। मवेशी चराने जाने वाले लोग समूह में निकलने लगे। कई ग्रामीण अकेले खेतों में जाने से बच रहे थे। जंगल और खेतों से लगे इलाकों में शाम ढलते ही आवाजाही कम हो गई थी।
बाघिन ने केवल इंसानों को ही निशाना नहीं बनाया। ग्रामीणों के अनुसार, उसने कई बकरियों और गायों का भी शिकार किया था। इससे ग्रामीणों में डर के साथ-साथ गुस्सा भी बढ़ता जा रहा था।
शिरजगांव कसबा में बिछा था जाल
दामू भाऊ आवारे पर हमला होने के बाद वन विभाग ने पिंकी की तलाश तेज कर दी थी। इलाके में निगरानी बढ़ाई गई और संभावित ठिकानों पर टीमों को तैनात किया गया। इसी दौरान वन विभाग को सूचना मिली कि बाघिन शिरजगांव कसबा क्षेत्र में मौजूद है।
टीम ने बिना समय गंवाए इलाके में घेराबंदी की। बाघिन की गतिविधियों पर लगातार नजर रखी गई। रेस्क्यू टीम के सामने चुनौती थी कि बाघिन को सुरक्षित तरीके से बेहोश किया जाए और उसके बाद उसे कब्जे में लिया जा सके।
जैसे ही उपयुक्त मौका मिला, टीम ने पिंकी को डार्ट किया। ट्रैंक्वलाइजेशन के बाद बाघिन जमीन पर गिर पड़ी और बेहोश हो गई। टीम ने उसे सुरक्षित तरीके से कब्जे में लेने की प्रक्रिया शुरू की।
इस कार्रवाई में पुणे के रेस्क्यू चैरिटेबल ट्रस्ट के मुख्य पशु चिकित्सक डॉ. हेमराज की भूमिका भी बताई गई है।
बेहोशी से मौत तक पहुंची कहानी
रेस्क्यू अभियान का सबसे अहम और दुखद मोड़ इसके बाद आया। जिस बाघिन को पकड़ने के लिए बेहोश किया गया था, उसे दोबारा होश में लाने की कोशिश सफल नहीं हो सकी। पिंकी की मौत हो गई।
यही वह बिंदु है जहां अब पूरे ऑपरेशन की बारीकी से जांच जरूरी हो जाती है। ट्रैंक्वलाइजेशन के बाद बाघिन की शारीरिक स्थिति कैसी थी? उसे किस तरह की निगरानी में रखा गया? उसे होश में लाने के लिए क्या प्रक्रिया अपनाई गई? उसकी मौत का तत्काल कारण क्या रहा? इन सवालों के जवाब जांच के बाद ही स्पष्ट हो सकेंगे। बाघिन की मौत के कारणों का पता लगाने के लिए पोस्टमार्टम और अन्य निर्धारित प्रक्रियाएं भी महत्वपूर्ण होंगी।
राहत मिली, लेकिन सवाल बाकी
पिंकी की मौत की खबर जैसे ही ग्रामीणों तक पहुंची, लोगों ने राहत की सांस ली। जिन खेतों और रास्तों पर जाने से लोग डर रहे थे, वहां अब फिर से सामान्य गतिविधियां लौटने की उम्मीद है। खासकर उन परिवारों के लिए यह बड़ी राहत है, जिनके सदस्य रोजाना खेतों और जंगल से लगे इलाकों में काम करने जाते हैं।
हालांकि, चार लोगों की मौत का दर्द आसानी से खत्म होने वाला नहीं है। पिंकी के हमलों में जान गंवाने वाले परिवारों के लिए यह कहानी राहत के साथ एक गहरी त्रासदी भी है।
पूर्व सांसद नवनीत राणा ने बाघिन को पकड़ने और जरूरत पड़ने पर उसे मारने की मांग की थी। भाजपा विधायक प्रवीण तायडे ने भी वन विभाग से तत्काल कार्रवाई की मांग की थी। लगातार बढ़ते दबाव के बीच वन विभाग ने आखिरकार अभियान चलाकर बाघिन को काबू में किया।
अब अगली चुनौती
पिंकी के खत्म होने के साथ एक बड़ा खतरा टल गया है, लेकिन वन विभाग की जिम्मेदारी अभी खत्म नहीं हुई है। अमरावती और आसपास के जंगलों से लगे इलाकों में वन्यजीवों की मौजूदगी बनी रहती है। ऐसे में ग्रामीणों की सुरक्षा के लिए निगरानी और गश्त जारी रखना जरूरी होगा।
पिंकी की कहानी ने एक बार फिर यह सवाल सामने ला दिया है कि जंगल और आबादी के बीच बढ़ता संपर्क किस तरह इंसानों और वन्यजीवों दोनों के लिए खतरा बन सकता है। चार लोगों की मौत के बाद जिस बाघिन को पकड़ने के लिए अभियान शुरू हुआ था, वह अब खुद भी नहीं रही। लेकिन उसकी मौत के साथ खत्म हुई दहशत के पीछे छूटे सवालों के जवाब अब वन विभाग की जांच तय करेगी।