- मोहम्मद अलीद्वारा
देश की रसोई से एक बार फिर राहत की खुशबू गायब है और उसकी जगह महंगाई के तीखे तड़के ने आम इंसान की आँखों में आँसू ला दिए हैं। घरेलू एलपीजी (LPG) गैस सिलेंडर की कीमतों में ₹29 की ताज़ा बढ़ोतरी सिर्फ एक आंकड़ा नहीं है, बल्कि यह देश के करोड़ों मध्यम और निम्न वर्गीय परिवारों के मासिक बजट पर सीधा प्रहार है।
जो सिलेंडर कल तक ₹941 में मिल रहा था, वह अब ₹970 का हो चुका है। ₹1000 के मनोवैज्ञानिक आंकड़े से महज़ 30 रुपये दूर खड़ा यह सिलेंडर आज देश के आम नागरिक से पूछ रहा है—’अच्छे दिन’ की परिभाषा में क्या रसोई का खाली होना भी शामिल है?
रसोई का बिगड़ता गणित
एक समय था जब रसोई गैस को धुएँ से मुक्ति और महिलाओं के सम्मान का प्रतीक मानकर घर-घर पहुँचाया गया था। लेकिन आज स्थिति यह है कि सिलेंडर तो घर में है, पर उसे दोबारा भरवाने की हिम्मत आम आदमी के बटुए में नहीं बची है। ₹29 की बढ़ोतरी पहली नज़र में शायद कुछ लोगों को छोटी लगे, लेकिन जब इसे दूध, सब्ज़ी, दाल और तेल की आसमान छूती कीमतों के साथ जोड़कर देखा जाता है, तो यह ऊँट की पीठ पर आखिरी तिनका साबित होती है।
मध्यम वर्ग, जो न तो मुफ़्त राशन की कतार में खड़ा हो सकता है और न ही बड़े कॉरपोरेट घरानों की तरह टैक्स छूट का आनंद ले सकता है, इस आर्थिक चक्की में सबसे ज़्यादा पिस रहा है।
सब्सिडी का गायब होना और ‘महँगी’ होती राहत
कहा गया था कि सब्सिडी सीधे खाते में आएगी, लेकिन धीरे-धीरे वह सब्सिडी ऊँट के मुँह में जीरे के समान रह गई और कई क्षेत्रों में तो पूरी तरह लुप्त हो चुकी है। ₹941 से ₹970 तक के सफर ने यह साफ़ कर दिया है कि बाज़ार के हवाले छोड़ी गई कीमतें आम जनता की जेब को लगातार खाली कर रही हैं। अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में कच्चे तेल या गैस की कीमतों का हवाला देकर घरेलू उपभोक्ताओं पर बोझ डालना अब एक स्थायी बहाना बन चुका है। लेकिन सवाल यह है कि जब अंतरराष्ट्रीय कीमतें गिरती हैं, तब उस अनुपात में राहत जनता तक क्यों नहीं पहुँचती?
सवालों के घेरे में नीतियाँ
एक तरफ देश को डिजिटल और आत्मनिर्भर बनाने के बड़े-बड़े दावे हैं, तो दूसरी तरफ बुनियादी ज़रूरतों के लिए आम आदमी का संघर्ष और गहरा होता जा रहा है। सरकारें चुनाव आते ही राहत के पैकेज घोषित करती हैं, और चुनाव बीतते ही ‘महंगाई का तड़का’ लगा दिया जाता है। क्या जनता की रसोई का बजट सिर्फ चुनावी गणित तय करेगा?
महंगाई की यह मार महिलाओं के घरेलू प्रबंधन कौशल की परीक्षा ले रही है। हर महीने ₹29-₹30 की यह क्रमिक बढ़ोतरी अंततः एक बड़े आर्थिक बोझ में बदल जाती है, जिससे बच्चों की शिक्षा, स्वास्थ्य और अन्य ज़रूरी खर्चों में कटौती करने पर मजबूर होना पड़ता है।
कब बुझेगी महंगाई की यह आंच?
₹970 का यह नया रेट कार्ड सिर्फ एक सरकारी अधिसूचना नहीं, बल्कि आम जनता की बेबसी का दस्तावेज़ है। विकास की बड़ी-बड़ी इमारतों के बीच अगर देश की रसोई ही धुएँ और चिंता से घिर जाए, तो उस विकास की चमक फीकी पड़ जाती है। सरकार को यह समझना होगा कि देश जीडीपी के आंकड़ों से बाद में, पहले अपनी थाली और रसोई के सुकून से चलता है। समय आ गया है कि इस बेलगाम महंगाई पर केवल चिंता न जताई जाए, बल्कि नीतियों में सुधार कर आम आदमी को इस ‘तड़के’ से स्थायी राहत दी जाए।
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