भोपाल। रुद्राक्ष किंग्सटन परिसर में शुक्रवार से श्रीमद्भागवत कथा शुरू हुई। पहले दिन कथावाचक देवकीनंदन ठाकुर ने श्रीमद्भागवत कथा सनातन परंपराओं में तिलक के महत्व को रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि जिस प्रकार अन्य धर्मों में पूजा-पद्धति और धार्मिक प्रतीकों का पालन किया जाता है, उसी तरह सनातन धर्म में तिलक केवल एक चिह्न नहीं बल्कि आस्था, अनुशासन और पहचान का प्रतीक है। उन्होंने श्रद्धालुओं से धर्म को केवल बाहरी प्रदर्शन तक सीमित न रखकर उसके मूल संस्कारों को जीवन में उतारने का आह्वान किया। तिलक की महत्ता समझाते हुए देवकीनंदन ठाकुर ने कहा कि जिस तरह मुस्लिम समाज में नमाज के दौरान धार्मिक परंपराओं का पालन किया जाता है, उसी प्रकार सनातन धर्म में भी तिलक का अपना महत्व है। उन्होंने कहा कि उनका उद्देश्य किसी की आलोचना करना नहीं, बल्कि सनातन परंपराओं के प्रति लोगों को जागरूक करना है। उन्होंने दोहराया कि धार्मिक आयोजनों में परंपराओं का सम्मान करने से श्रद्धालुओं को उसका पूर्ण आध्यात्मिक लाभ मिलता है।
सोशल मीडिया वाले हिंदुत्व पर उठाए सवाल
देवकीनंदन ठाकुर ने कहा कि आज सोशल मीडिया पर बड़ी संख्या में लोग खुद को हिंदू बताते हैं, लेकिन वास्तविक जीवन में धर्म के मूल सिद्धांतों का पालन नहीं करते। उन्होंने कहा, “हिंदू दिखो मत, हिंदू बनो।
यदि सनातन धर्म के अनुयायी ईमानदारी से उसके आदर्शों को जीवन में अपनाएं तो भारत ही नहीं, पूरी दुनिया में सनातन का ध्वज फहराएगा।” उन्होंने सत्य को धर्म का सबसे बड़ा आधार बताते हुए कहा कि छोटी-छोटी बातों पर झूठ बोलना भी व्यक्ति को पाप की ओर ले जाता है।
बोले- बिना तिलक पूजा स्वीकार नहीं होती
कथा के दौरान ठाकुर ने तिलक लगाने की परंपरा पर भी विस्तार से चर्चा की। उन्होंने कहा कि किसी भी धार्मिक अनुष्ठान की शुरुआत तिलक के साथ होती है और सनातन परंपरा में इसका विशेष महत्व है।
उन्होंने श्रद्धालुओं से कहा कि कथा श्रवण जैसे धार्मिक आयोजन में भी तिलक लगाकर आना चाहिए। इस दौरान उन्होंने कहा कि भगवान राम, कृष्ण, शिव और हनुमान सभी के स्वरूप में तिलक दिखाई देता है, इसलिए सनातन परंपरा का पालन करने वालों को भी इसे अपनाना चाहिए।
दुनिया की हर सत्ता सीमित, ठाकुर जी की सत्ता असीमित
कथा के दौरान ठाकुर ने ईश्वर की सर्वव्यापकता पर भी प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि जनप्रतिनिधियों, मंत्रियों, मुख्यमंत्रियों और यहां तक कि देशों की भी अपनी-अपनी सीमाएं होती हैं, लेकिन भगवान की सत्ता किसी सीमा में बंधी नहीं है।
उन्होंने कहा कि मनुष्य का मन अक्सर उसके नियंत्रण में नहीं रहता और कथा में बैठे हुए भी वह दूसरी योजनाएं बनाने लगता है, जबकि भगवान का चित्त पूर्ण रूप से स्थिर और आनंदमय होता है। श्रद्धालुओं से उन्होंने कथा के दौरान मन को एकाग्र रखने और भक्ति में लीन होने का आह्वान किया।
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