“एक परचा क्या खारिज हुआ, मीनाक्षी नटराजन का ‘राजनीतिक पुनर्जन्म’ हो गया!”

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  • मोहम्मद अली

भोपाल। ​राजनीति की अपनी एक ‘केमिस्ट्री’ होती है, जो कभी-कभी गणित के सारे फॉर्मूलों को फेल कर देती है। कोई नेता दशकों तक संगठन की पथरीली गलियारों में एड़ी घिसता है, रैलियों में गला फाड़ता है, हारता है, जीतता है, मगर फिर भी दिल्ली-भोपाल उसे वो तवज्जो नहीं देते। और कभी, किसी अफसर की एक स्याही, विपक्ष की एक शातिर आपत्ति और एक संदेहास्पद कानूनी व्याख्या, किसी नेता को रातों-रात राष्ट्रीय राजनीति के सबसे चमकदार ‘लाइट-हाउस’ पर लाकर खड़ा कर देती है।
​मीनाक्षी नटराजन इस समय इसी ‘पॉलिटिकल मिरेकल’ (राजनीतिक चमत्कार) का चेहरा हैं।
​नामांकन में कांग्रेस से वाकई कोई तकनीकी चूक हुई थी, या फिर बीजेपी ने असाधारण कानूनी दूरबीन लगाकर बाल की खाल निकाली थी? या फिर, कैमरे के पीछे बैठे किसी ‘आज्ञाकारी’ चुनाव अधिकारी ने अपनी ताकत का जरूरत से ज्यादा प्रदर्शन कर दिया? वजह जो भी हो, राजनीतिक नतीजा बिल्कुल शीशे की तरह साफ है—कांग्रेस का एक राज्यसभा नामांकन खारिज जरूर हुआ है, लेकिन मीनाक्षी नटराजन की राजनीतिक शख्सियत का ‘पुनर्जन्म’ हो चुका है।
​आज की तारीख में मध्य प्रदेश की सियासत में मीनाक्षी की धमक, दिग्विजय सिंह और कमलनाथ जैसे दिग्गजों से भी ज्यादा गूंज रही है। इसका मतलब यह कतई नहीं है कि मीनाक्षी का कद या वोट बैंक अचानक इन दोनों से बड़ा हो गया है; इसका मतलब सिर्फ इतना है कि इस समय सूबे की पूरी राजनीतिक स्क्रिप्ट मीनाक्षी के इर्द-गिर्द लिखी जा रही है। कल तक जो दिग्विजय और कमलनाथ खुद ‘पूरी कहानी’ हुआ करते थे, वो आज मीनाक्षी के समर्थन में खड़े ‘सह-कलाकार’ जैसे नजर आ रहे हैं। पावर पॉलिटिक्स में इसी दृश्यात्मक बदलाव को ‘लीडरशिप का नया पदानुक्रम’ कहते हैं।
​कल तक मीनाक्षी सिर्फ एक पूर्व सांसद, राहुल गांधी की पुरानी सिपहसालार और संगठन की एक अनुशासित चेहरा थीं। आज वे उस ‘मजलूम’ महिला का चेहरा बन चुकी हैं, जिसे संसद की दहलीज पर पहुंचने से पहले ही साजिशन रोक दिया गया। सियासत का नियम है—हारे हुए उम्मीदवार को सिर्फ सहानुभूति मिलती है, लेकिन ‘अन्याय के शिकार’ को ‘नैतिक पूंजी’ मिलती है। यह वो फिक्स्ड डिपॉजिट है, जो चुनाव की हार-जीत और सांसदों की सदस्यता से कहीं ज्यादा टिकाऊ होता है; बशर्ते नेता को इसे भुनाना आता हो।
​यह सच है कि मीनाक्षी की अपनी कुछ सीमाएं रही हैं। उन्हें स्वभाव से थोड़ा अक्खड़, संवाद में रिजर्व और संगठन चलाने में बेहद सख्त माना जाता रहा है, जिसे लेकर नाराजगी भी थी। लेकिन इस एक विवाद ने उनकी इन तमाम ‘कमजोरियों’ का पूरा परसेप्शन (छवि) ही बदल दिया है। जो कल तक ‘अक्खड़पन’ था, वह अब सत्ता के सामने ‘न झुकने वाली रीढ़’ बनकर उभरेगा। जो ‘दूरी’ थी, उसे अब सादगी और स्वाभिमान का तमगा मिलेगा। और जो संगठनात्मक ‘कठोरता’ थी, उसे सिद्धांतों की बेजोड़ निष्ठा कहा जाएगा।
​मगर असली इम्तिहान अब कांग्रेस का है। क्या वो मीनाक्षी को केवल दो-चार प्रेस कॉन्फ्रेंस, बोरिंग धरनों और “लोकतंत्र की हत्या” जैसे घिसे-पिटे जुमलों तक समेट कर रख देगी? या फिर उन्हें मध्य प्रदेश की सड़कों पर उतारकर एक आक्रामक राजनीतिक आंदोलन का ‘पोस्टर गर्ल’ बनाएगी? अगर कांग्रेस में दम है, तो उन्हें गांव-गांव ले जाए, महिलाओं और युवाओं के बीच खड़ा करे और सीधे जनता की अदालत से पूछे—क्या एक प्रशासनिक पेंच किसी महिला की संसदीय राह का रोड़ा बन सकता है?
​बीजेपी ने अगर रणनीतिक तौर पर यह चक्रव्यूह रचा था, तो मुमकिन है कि उसने संसद में कांग्रेस की एक सीट कम कर दी हो; लेकिन अनजाने में उसने कांग्रेस को एक राष्ट्रीय कद का लड़ाकू नेता सौंप दिया है। और अगर कांग्रेस ने यह मुसीबत अपनी ही सुस्ती और लापरवाही से सहेली है, तो वक्त ने उसकी इस ऐतिहासिक गलती में भी एक सुनहरा मौका छिपाकर दिया है।
​इतिहास गवाह है कि राजनीति में जब-जब संसद की कोई खिड़की बंद की जाती है, तब-तब सड़कों से जननेता बनने का एक बहुत बड़ा दरवाजा खुल जाता है। मीनाक्षी नटराजन इस वक्त ठीक उसी दरवाजे की चौखट पर खड़ी हैं।

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